नितानन्द का जीवन परिचय

संतकवि नितानन्द का साहित्यक जीवन परिचय |

1 . जीवन परिचय :-

हरियाणा के सन्त कवियों में नितानन्द  का महत्वपूर्ण स्थान है | इनके जीवन के विषय में अंनत साक्ष्य के प्राथमिक आधार नहीं मिलते | जनश्रुति के आधार पर माना जाता है की इनका जनम नारनोल में हुआ है | इनका बचपन का नाम नंदलाल था | इनके पिता भरतपुर रियासत में अधिकारी थे और वे स्वय तहसीलदार थे | नितानंद के अनुसार इनका जन्म ब्राह्मण कुल में हुआ था

और ये गुमानिदास जी के सिष्य थे | इनके दो विवाह का विवरण मिलता है |नोकरी छोड़कर ये सिताबराय के पास रिवाड़ी में रहने लगे | कहा जाता है की रेवाड़ी के जंगलो में इनकी मुलाकात गुमानिदास जी से हुई | गुमानिदास जी ने योग्य पात्र समझकर इन्हें सिक्षा  दी और इनका नाम नितानन्द रखा |  

नितानंद ने सांसारिक जीवन को त्यागकर विरक्त संयासियो का जीवन अपना लिया था |उनके पास केवल चार वस्तुए थी -एक हलकी सी चादर , एक गुदड़ी ,जो सर्दियो में ओढ़ने और गर्मियो में बिछाने के कम आती थी , भोजन के लिए एक कटोरी और पानी पिने के लिए एक लुटिया |इन्होने भगवद भक्ति के लिए चार गाँवों -माजरा ,सुबाना ,बास तथा महमूदपुर को अपनाया |

ये जयपुर के निकट नारायणा में संत दादू दयाल के दादूद्वार में भी गए थे|ये छुडानी गाँव के निवासी संत गरीबदास जी के सम्पर्क में भी आये |नितानंद जी का जन्मकाल ज्ञात नहीं |किन्तु कहा जाता है की इनका स्वर्गवास संवत 1856  वि. के भाद्प्रद शुकल प्रतिपदा को हुआ |फाल्गुन की पूर्णिमा और चैत्र की प्रतिपदा को रोहतक जिले के गाँव माजरा में वार्षिक मेला लगता है , जिसमें संत नितानंद की सुरक्षित छः वस्तुए ;-पलंग ,चादर ,गुदड़ी,लुटिया ,कटोरी तथा पादुका -यात्रियों को दिखाई जाती हैं|

2 . प्रमुख रचनाए-

संतकवि नितान्न्द की काव्य रचनाये  ‘सत्य सिधान्त प्रकाश ‘ में संकलित हैं| ‘सत्य सिधान्त प्रकाश ‘ का प्रकाशन माजरा निवासी मास्टर देशराम और सेठ राम रिछपाल के सहयोग से हुआ |माजरा में नितानंद जी के स्थान पर उनकी वाणियो की हस्तलिखित प्रति विद्यमान हैं|इनका रचनाकाल सन 1802 है |वाणियो का संकलन दो भागो में है |पहले भाग में 60 अंग , जिनमे 3649  साखियाँ हैं |दुसरे भाग में ‘सबद ‘ [शब्द ] हैं ,जिंनकी संख्या 417 है |

3 . काव्यगत विशेषताएं –

संत नितानंद जी मुल्तः विरक्त महात्मा थे|उनकी रचनाओं में सर्वत्र प्रभू भक्ति का ही उल्लेख हुआ है |वे किसी संप्रदाय विशेष से सम्बंधित नहीं थे|उनकी वाणी उनके ह्रदय के मुक्त उदगार थे|उनके द्वारा रचित काव्य की प्रमुख विशेषताएँ निमंलिखित हैं –

(i) गुरु को महत्व :-

नितानद ने अन्य संत कवियों की भाँती गुरु को विशेस महत्व दिया है उनका मत है की गुरु ही अपने ज्ञान द्वारा साधक के मन की आँखों को खोलता है | गुरु की कृपा से ही साधक कुमारग त्यागकर सदमार्ग पर चलता है | वे सतगुरु दवरा पर्दान किये गए ज्ञ्यान के बदले में दिए गए जीवन के बलिदान को भी तुच्छ कहते है –

                                                            ” नितानंद गुरुदेव पर , तन मन धन सब वार |

                                                                 तऊ  उन्हों के मंगते , वे सतगुरु दातार ||”

(ii) सदाचार पर बल :- 

संतकवि नितानंद ने मनुष्य के सदाचार पर बल दिया हैं क्युकी सदाचार पर चलकर ही वह आतम सुधि कर सकता है | उन्हें मन की सवच्छता , पवित्रता और सयम पर भी बल दिया है –

                                                       ” अमृत अमर छांडकर बोरी , विषय बिज क्यों बोवे री|

                                                          एसी बेर फेर कहाँ पाइए , मुंड पकड़कर रोवे री ||”

 

(iii)  माया :- 

माया इश्वर की मूल प्रेरक शक्ति है | वह इश्वर पर आश्रित और उसी से उत्पन है | नितानंद ने संसार के भोगो और रोंगों का मूल कारण माया को ही बताया है –

                                                                ” माया से काया भई , काया से सब भोग |

                                                               भोगो से सब को लाग्या , जन्म मरण का रोग ||”

संतकवि नितानंद ने भी कबीर के भाँती माया को महाठग बताया है माया पांच विकारो के फंदे द्वारा स्थान स्थान पर सबको ठगती रहती है-

                                                               ” ठांव ठांव ठगती फिरे , लिए पंच ठग लार |

                                                                लाडू लोभ दिखाय कर , लिए मुगद नर नार ||”

वे माया को सेवल के वर्क्ष की भाँती एक महा भ्रम कहते है | जेसे सेवल का फल पकने पर उसमे से रुई निकलकर उड़ जाती है और पक्षी पछताता रह जाता है , वेसे माया भी बहुत ब्राह्मक है और इसके ब्रहम को ना पहचाने वाले अंधे है |

                                                               ” माया तरवर सिमिरी का , साखा भरम विकार |

                                                                   जन्म मरण फल विष भरा , अंधे भोगंहार ||”

 

(iv) आत्मा की विराह्नुभुती :-

संतकवि नितानद के काव्यो में आत्मा के परमात्मा से बिछुड़ने पर उत्पन विराह्नुभुती का अनुपम चित्रण किया गया है | उनकी विराह्नुभुती ‘विरह का अंग ‘ विषयक सखियों में व्यक्त हुई है | उन्होंने तुलसी और सूरदास के भाँती चकवे और चकवी को अपनी विराह्नुभुती का प्रतीक माना है –

                                                               ‘ चकवी बिछड़ी रेन की , सुर उसे मिल जाय | 

                                                                  जा से साहब बिछड़े , जन्म जन्म पछताय ||”

 

(V) भक्ति भावना :- 

संतकवि नितानंद ने निर्गुण इश्वर की उपासना की है | उन्होंने अहंकार , इछाओ , आशाओं के त्याग पर विशेष बल दिया है | उनकी भक्ति में अनन्य भाव आतम समर्पण और निष्काम भाव पर विशेष बल दिया गया है |

                                                         तन और मन अपना सवर्स , सोंपे साहब हाथ बिकाने री |

                                                        नितानंद मिले सवामी गुमानी , लग गयी चोट निशाने री ||”

 

(VI) रहस्यवादी भावना :- 

नितानंद के काव्य में रहस्यवादी चेतना के भी दर्शन होते है | उनके काव्य के अध्यन से स्पस्ट हो जाता है की उन्होंने आत्मा और परमात्मा के संबंधो को सांसारिक जीवन के माध्यम से अभिव्यक्त किया है | उन्होंने आत्मा और परमात्मा में प्रिय और प्रीतम के साथ साथ वैराग्य की भावना भी है |

                                                              ” जिस नगरी वालम बसे , हम उस नगर चला |

                                                                अंखिया पंख लगाय कर , सन्मुख जाय मिला ||”

 

4 . भासा शेली :-

संतकवि नितानंद के काव्यो की भासा अंत्यंत सरल एव सरस हे | उनकी भाषा में भावो को अभिव्यक्त करने की अद्भुत शमता है | उनकी भासा में सथानीय भाषा के सब्दो का अंत्यंत सुन्दर पर्योग हुआ है | उनकी भाषा जन भाषा के निकट है |

नितानंद ने अपने युग में प्रचलित भाषा शेली को अपनाया है | उसमे सपष्टता , सरलता , मधुरता आदि सभी गुण है | उन्होंने ‘ साखी’ और ‘सब्द’ दो मुख्या रूप में अपनी वाणी को प्रस्तुत किया है |

अन्य संत कविओ की भाँती काव्य रचना उनका साध्य नहीं , अपितु अपनी भक्ति भावना को व्यक्त करने का साधन था|

उनके काव्य में विविध अलंकारों का सहज एव सव्भाविक पर्योग हुआ है , जिसे उनके काव्य में भाव सोंदर्य की अभिवृद्धि हुई है | उनके काव्य की भाषा में मुहावरे का सटीक पर्योग भी देखते ही बनता है |

 

अंत ; निष्कर्ष रूप से कहा जा सकता है की नितानंद के काव्यो का भाव पक्ष तथा कला पक्ष सामान रूप से समृद्ध एव विकशित है | वे वस्तुत : हरियाणा के सन्त कवियों में महत्वपूरण अधिकारी है | 

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