गरीबदास का जीवन परिचय

संतकवि गरीबदास का साहित्यक जीवन परिचय |

1 . जीवन परिचय :-

गरीबदास का नाम सन्त कवियों में बड़े आदर के साथ लिया जाता है | ये संत पहले और कवी बाद में है | इन्होने निर्गुण संत कवियों की भाति कविताओ को अपने विचारों व्यक्त करने का पर्मुख साधन माना है | इनका साध्य तो प्रभु भक्ति है | गरीबदास का जन्म रोहतक जिले के छुडानी गाँव में सन 1717 में हुआ था | ये कृसक परिवार में उत्पन हुए थे

संत गरीबदास अत्यंत निश्छल एव सात्विक परवर्ती वाले व्यक्ति थे | इन्होने गरीब पंथ की सथापना की है | ये आजीवन अपने उपदेशो से समाज के लोगो का कल्याण करने में लगे रहे है | इन्होने घर्स्थ जीवन का पालन करते हुए इश्वर भक्ति में मन को रमाए रखा | अपने जीवन के अनुभव को कविता रूप में परिणित करके मानवता का बहुत बड़ा कल्याण किया है | इनकी म्रत्यु सन 1778 में हुई थी |

2 . प्रमुख रचनाए :-

संत गरीबदास ने अपने जीवन में काव्य रचना के माध्यम से जनमानस को इस्वर की भक्ति की और प्रेरित करने का सफल पर्यास किया है | इनकी रचनाये कविकर्म और मानव जीवन की आचार सहिंता का बहुत बड़ा दस्तावेज है | इनकी प्रमुख रचनाये भक्तराम कृत ‘संत गरीबदास का जीवन चरित ‘ तथा ‘ जेतराम की वाणी ‘ सिर्ष्क ग्रंथो में उपलब्ध है |

3 . काव्यगत विशेषताए :-

संत कवी गरीबदास की काव्यगत विशेषताए  निमंलिखित है –

( i )  गुरु की महिमा :- 

संत गरीबदास की भक्ति भावना में गुरु का महत्वपूरण स्थान है | साधू महिमा और संत  संगती पर भी उन्होंने बल दिया है | वो मानते है की गुरु ही मानव की जीवन रूपी नाव को पार लगा सकता है | सतगुरु ही उसके अवगुणों को दूर करके उसके जीवन को सार्थक बनाता है यथा –

                                                  ”गरीब ,परमानंद से बिछरया , योह मन हंशा काग |

                                                        मुक्ति नहीं सतगुरु बिना , कहा छोपोले दाग ||”

 

( ii )  निर्गुण ईश्वर में विश्वास :- 

संत गरीबदास निर्गुण इश्वर में विशवास रखते है | ये जिव को ब्रहा  से भीन ना मानकर उसे ब्रहा का ही अंश मानते है | उनका ब्रहा अविगत है | उनका कोई निश्चित रूप , रंग , सवाद , अकार , सवरूप नहीं है | वह घट घटवासी है | वह कही बाहर नहीं , अपितु हमारे भीतर ही अव्श्थित है ; यथा –

                                               ” कुछ रूप न रेख ववेक लख्या चाख्या , नहीं मीठा खारा है 

                                               गलतान समान समाय रहया , जो पिंड ब्रहाड़ से नयारा है |”

 

( iii )  सत्संगति की महिमा :- 

संत गरीबदास ने अन्य भक्त कवियों की भाति संत्संगती पर बल दिया है | संत्संगती से मनुष्य बुरे मार्ग को त्याग कर सचेमार्ग को अपना लेता है | संत्संगती के महत्व पर परकाश डालते हुए संत गरीबदास ने लिखा है –

                                                   ” गरीब साधो की संगती करे , बडभागी बड देब |

                                                   आपन  तो  संशय   नहीं  ,  और  उतारे   –  खेव ||”

 

(iv) पाखंडवाद का विरोध :- 

संत गरीबदास जी ने विभीन धर्मो में प्रचलित रुढियो , अन्धविश्वासो का कड़ा विरोध किया | उनके मतानुसार दान , व्रत , तीर्थ , यज्ञ आदि से जिव की मुक्ति सवर्था असंभव है | राम नाम के समरण से ही जिव को मुक्ति मोक्ष प्राप्त हो सकता है यथा –

                                                  ” गरीब कोटिक तीथ व्रत करि , कोटि गज करि दान | 

                                                     कोटि   अशव्  विपरो   दिये   ,   मिटे न     खेच्तान ||”

 

(V)  धर्मगत एव जातिगत सकिरणतायो का विरोध :- 

संत गरीबदास जी ने अपने काव्यो में जाती पाती , वर्ग , धर्म , सम्पर्दाये आदि के भेदभाव का कदा विरोध किया है | उन्होंने धर्मगत सकिरणताओ एव पाखंडो पर प्रबल परहार किया है | वे जातिवाद का खंडन निमंलिखित पंक्तियों में करते है –

                                                   ” मुसलमान को गाय भखी , हिन्दू खाल्या सुर |  

                                                            गरीबदास दुहु दिनसे , राम रहीम दूर ||”

 

(vii)  साधू की महिमा :- 

भारतीय भक्ति के छेत्र में साधू की महिमा का गान किया है | गरीबदास ने भी अपने काव्य में साधू की महिमा का जमकर वर्णन किया है | उन्होंने तो साधू का आना ही धन्य माना है , क्युकी साधू के आने से ही मानव के जीवन पर उसका सद्पर्भाव पड़ता है | संत गरीबदास ने इस सम्बन्ध में लिखा है —

                                                   ” गरीब , धन्य जननी धन्यभूमि , धन्य नगरी धन्य देश |

                                                           धन्य करणी धन्य कुल धन्य , जहा साधू परवेश ||”

 

संत गरीबदास ने साधुओ के गुणों एव उनकी परवर्ती पर भी विस्तार रूप में प्रकाश डाला है | उन्होंने बताया है की साधू की जाती तो पारब्रह की जाती के समान होती है , क्युकी वे बिना भेदभाव के सबका कल्याण करने में लीन रहते है ,यथा –

                                                            ” गरीब ऐसे साधू संत जन , पारब्रह की जाति |

                                                                   सदा रते हरी नाम्स्यो , अंतर नाही घात ||”

 

(vii) विवेक एव विचार पर बल :- 

संत गरीबदास ने हर कार्य को विचारपूर्वक एव विवेक के साथ करने का उपदेश दिया है | हर कदम विचार कर रखना चाहिए , क्युकी बिना विचार किया गया कार्य हानिकारक होता है | इस सम्बन्ध में संत गरीबदास ने लिखा है –

                                                              ” गरीब समझी विचारे बोलना , समझी विचारे चाल | 

                                                               समझी   विचारे   जागना , समझी   विचारे ख्याल ||”

 

4 . भाषा शेली :-

संत गरीबदास ने अपने काव्य में सरल , सहज एव पर्भावशाली भासा का पर्योग किया है | उनके काव्य की भासा उनके अपने युग की जनभासा है |उसमे सरलता सपष्टता तथा प्रतीकात्मकता है | उनका समपूर्ण काव्य दोहों एव गेय काव्य में रचित है | गरीबदास ने अपने काव्य में तद्भव , सब्दो के साथ साथ हरियाणवी लोकभासा के सब्दो का प्रसंगाकुल एव सार्थक पर्योग किया है | गरीबदास के काव्य के भासा का यह उधारण देखिये –

                                                                   ” गरीब कस्तूरी की वासना , मिरगा लेत सुवास |

                                                                    निरखि   परखी   पावे नहीं , बहुरि ढढोरे घास ||”

 

अंत ;- उपयुक्त विवेचन के आधार पर कहा जा सकता है की गरीबदास के काव्य का भाव पक्ष जितना समृद्ध है ,उतना ही उनका  कलापक्ष भी विकशित है | संतकवि गरीबदास के काव्य का हिंदी संकाव्य में महत्वपूरण स्थान है |

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